श्री दुर्गा देवी स्तोत्रम् 

श्री दुर्गा देवी स्तोत्रम्

युधिष्ठिर विरचित – सम्पूर्ण पाठ, महत्व एवं आध्यात्मिक व्याख्या

श्री दुर्गा देवी स्तोत्र महाभारत काल में युधिष्ठिर द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तुति धर्म, विजय और आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। नवरात्रि, दुर्गाष्टमी तथा विशेष साधना के समय इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

🌺 आध्यात्मिक संकेत: यह स्तोत्र केवल विजय की कामना नहीं करता, बल्कि धर्म की स्थापना और अंतःशक्ति के जागरण का संदेश देता है।

📖 श्री दुर्गा देवी स्तोत्र – सम्पूर्ण पाठ

श्रीगणेशाय नमः । श्री दुर्गायै नमः । नगरांत प्रवेशले पंडुनंदन । तो देखिले दुर्गास्थान । धर्मराज करी स्तवन । जगदंबेचे तेधवा ॥ १ ॥ जय जय दुर्गे भुवनेश्वरी । यशोदा गर्भ संभवकुमारी । इंदिरा रमण सहोदरी । नारायणी चंडिकेंऽबिके ॥ २ ॥ जय जय जगदंबे विश्र्व कुटुंबिनी । मूलस्फूर्ति प्रणवरुपिणी । ब्रह्मानंदपददायिनी । चिद्विलासिनी अंबिके तू ॥ ३ ॥ जय जय धराधर कुमारी । सौभाग्य गंगे त्रिपुर सुंदरी । हेरंब जननी अंतरी । प्रवेशीं तू आमुचे ॥ ४ ॥ भक्तह्रदयारविंद भ्रमरी । तुझे कृपाबळे निर्धारी । अतिगूढ निगमार्थ विवरी । काव्यरचना करी अद् भुत ॥ ५ ॥ तुझिये कृपावलोकनेंकरुन । गर्भांधासी येतील नयन । पांगुळा करील गमन । दूर पंथे जाऊनी ॥ ६ ॥ जन्मादारभ्य जो मुका । होय वाचस्पतिसमान बोलका । तूं स्वानंदसरोवर मराळिका । होसी भाविकां सुप्रसन्न ॥ ७ ॥ ब्रह्मानंदे आदिजननी । तव कृपेची नौका करुनि । दुस्तर भवसिंधु उल्लंघूनी । निवृत्ती तटां जाइजे ॥ ८ ॥ जय जय आदिकुमारिके । जय जय मूलपीठनायीके । सकल सौभाग्य दायीके । जगदंबिके मूलप्रकृतिके ॥ ९ ॥ जय जय भार्गवप्रिये भवानी । भयनाशके भक्तवरदायिनी । सुभद्रकारिके हिमनगनंदिनी । त्रिपुरसुंदरी महामाये ॥ १० ॥ जय जय आनंदकासारमराळिके । पद्मनयने दुरितवनपावके । त्रिविधतापभवमोचके । सर्व व्यापके मृडानी ॥ ११ ॥ शिवमानसकनकलतिके । जय चातुर्य चंपककलिके । शुंभनिशुंभदैत्यांतके । निजजनपालके अपर्णे ॥ १२ ॥ तव मुखकमल शोभा देखोनी । इंदुबिंब गेले विरोनी । ब्रह्मादिदेव बाळें तान्ही । स्वानंदसदनी निजविसी ॥ १३ ॥ जीव शिव दोन्ही बाळकें । अंबे त्वां निर्मिली कौतुकें । स्वरुप तुझे जीव नोळखे । म्हणोनि पडला आवर्ती ॥ १४ ॥ शिव तुझे स्मरणीं सावचित्त । म्हणोनि तो नित्यमुक्त । स्वानंदपद हातां येत । तुझे कृपेनें जननिये ॥ १५ ॥ मेळवूनि पंचभूतांचा मेळ । त्वां रचिला ब्रह्मांडगोळ । इच्छा परततां तत्काळ । क्षणें निर्मूळे करिसी तूं ॥ १६ ॥ अनंत बालादित्यश्रेणी । तव प्रभेमाजी गेल्या लपोनि । सकल सौभाग्य शुभकल्याणी । रमारमणवरप्रदे ॥ १७ ॥ जय शंबरि पुहर वल्लभे । त्रैलोक्य नगरारंभस्तंभे । आदिमाये आत्मप्रिये । सकलारंभे मूलप्रकृती ॥ १८ ॥ जय करुणामृतसरिते । भक्तपालके गुणभरिते । अनंतब्रह्मांड फलांकिते । आदिमाये अन्नपूर्णे ॥ १९ ॥ तूं सच्चिदानंदप्रणवरुपिणी । सकल चराचर व्यापिनी । सर्गस्थित्यंत कारिणी । भवमोचिनी ब्रह्मानंदे ॥ २० ॥ ऐकोनि धर्माचे स्तवन । दुर्गा जाहली प्रसन्न । म्हणे तुमचे शत्रू संहारीन । राज्यीं स्थापीन धर्माते ॥ २१ ॥ तुम्ही वास करा येथ । प्रगटी नेदीं जनांत । शत्रू क्षय पावती समस्त । सुख अद् भुत तुम्हां होय ॥ २२ ॥ त्वां जें स्तोत्र केलें पूर्ण । तें जे त्रिकाल करिती पठन । त्यांचे सर्व काम पुरवीन । सदा रक्षीन अंतर्बाह्य ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीयुधिष्ठिरविरचितं श्रीदुर्गा स्तोत्रं संपूर्णम् ॥

🕉 दुर्गा देवी स्तोत्र का आध्यात्मिक महत्व

श्री दुर्गा देवी स्तोत्र धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा देवी की स्तुति के रूप में वर्णित है। यह स्तोत्र केवल विजय की कामना नहीं करता, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना, आंतरिक शक्ति और आध्यात्मिक संरक्षण का संदेश देता है।

स्तोत्र में देवी को मूलप्रकृति, आदिशक्ति, त्रिपुरसुंदरी, नारायणी, अन्नपूर्णा आदि नामों से संबोधित किया गया है। यह दर्शाता है कि शक्ति ही सृष्टि, पालन और संहार का मूल तत्त्व है।

देवी को “सच्चिदानंद स्वरूपिणी” कहा गया है — अर्थात् वे सत् (सत्य), चित् (चेतना) और आनंद का मूल स्रोत हैं। भक्त जब श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसका मन स्थिर और साहसी बनता है।


✨ स्तोत्र पाठ के संभावित आध्यात्मिक लाभ

  • आंतरिक साहस और मानसिक दृढ़ता
  • नवरात्रि में विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा
  • धर्म और सत्य के मार्ग पर स्थिरता
  • भय और नकारात्मक विचारों में कमी
  • भक्ति और आत्मबल में वृद्धि

शास्त्रीय परंपरा के अनुसार, इस स्तोत्र का त्रिकाल पाठ (सुबह, दोपहर, संध्या) विशेष रूप से फलदायी माना गया है।


📚 दुर्गा साधना को और गहराई से समझें

दुर्गा उपासना के व्यापक स्वरूप को समझने के लिए नीचे दिए गए लेख अवश्य पढ़ें:


📖 संपूर्ण स्तोत्र संग्रह


🔗 दुर्गा भक्ति से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण लेख

माँ दुर्गा की उपासना को और गहराई से समझने के लिए इन लेखों को पढ़ें


❓ दुर्गा देवी स्तोत्र से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. दुर्गा देवी स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

नवरात्रि, दुर्गाष्टमी, या विशेष साधना के समय इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

2. क्या इस स्तोत्र का दैनिक पाठ किया जा सकता है?

हाँ, श्रद्धा और नियमपूर्वक त्रिकाल पाठ करने की परंपरा भी प्रचलित है।

3. क्या यह स्तोत्र युधिष्ठिर द्वारा रचित है?

परंपरागत मान्यता के अनुसार यह स्तोत्र धर्मराज युधिष्ठिर से संबद्ध माना जाता है।

4. स्तोत्र और चालीसा में क्या अंतर है?

स्तोत्र संस्कृत या प्राचीन भाषा में रचित स्तुति होती है, जबकि चालीसा सामान्यतः 40 चौपाइयों का भक्तिपूर्ण पाठ होता है।


🌺 निष्कर्ष

श्री दुर्गा देवी स्तोत्र केवल युद्ध विजय की कामना नहीं, बल्कि धर्म, साहस और आत्मबल का जागरण है। यह स्तुति हमें याद दिलाती है कि शक्ति केवल बाहरी विजय नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और सत्य की स्थापना का माध्यम है।

नियमित श्रद्धा और भक्ति से किया गया स्तोत्र पाठ मन में शांति, साहस और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *