एकादशी व्रत सनातन परंपरा में आत्म-शुद्धि, संयम और भक्ति का विशेष पर्व है। यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और चेतना को ऊँचा उठाने का मार्ग है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने हेतु एकादशी को सर्वोत्तम माना गया है।
एकादशी व्रत का महत्व
एकादशी तिथि मन और शरीर को शुद्ध करने के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन अन्न का त्याग करने से मन हल्का होता है और ध्यान में स्थिरता आती है।
एकादशी हमें सिखाती है कि — संयम ही वास्तविक शक्ति है।
एकादशी व्रत विधि (सरल क्रम)
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- भगवान विष्णु या कृष्ण का ध्यान करें
- व्रत का संकल्प लें
- दिनभर फल, दूध या जल ग्रहण करें
- संध्या समय दीपक जलाकर भजन या मंत्र जप करें
- द्वादशी को व्रत पारण करें
एकादशी व्रत के नियम
- अन्न और तामसिक भोजन से परहेज करें
- क्रोध, निंदा और असत्य से दूरी रखें
- मन को शांत और सात्त्विक रखें
- संभव हो तो मौन और ध्यान का अभ्यास करें
एकादशी व्रत की कथा (संक्षेप)
पुराणों में वर्णन है कि एकादशी देवी स्वयं भगवान विष्णु से प्रकट हुईं। उन्होंने मनुष्य को पापों से मुक्त करने का वरदान माँगा। तभी से एकादशी व्रत को मुक्ति और शुद्धि का मार्ग माना गया।
एकादशी मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
यह मंत्र मन को स्थिर करता है और भक्ति भाव को गहरा करता है।
🔁 108 बार जप करें
एकादशी व्रत का फल
- मानसिक शांति और संयम
- विचारों में स्पष्टता
- भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि
एकादशी का फल केवल भौतिक नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन के रूप में प्राप्त होता है।
निष्कर्ष
एकादशी हमें यह स्मरण कराती है कि — भोग से नहीं, संयम से जीवन पवित्र होता है। जब इंद्रियाँ शांत होती हैं, तभी भक्ति और विवेक जागृत होता है।
